महर्षि वाल्मीकि
महर्षि वाल्मीकि
परिचय
महर्षि वाल्मीकि को जगत विख्यात महाकाव्य रामायण के रचयिता के रूप में जाना जाता है I कई हजार वर्ष पूर्व रचित
रामायण में समय, स्थान आदि के बारे में जो सटीक वर्णन किया गया है उसे देखकर लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं कि
आज जब तकनीकी के इस युग में भी किसी वस्तु विशेष के बारे में सटीक जानकारी प्राप्त कर पाना मुश्किल हो जाता है तो इतने पुराने समय में समय, स्थान और घटनाक्रमों के बीच तारतम्य स्थापित कैसे किया गया होगा l
जन्म और प्रारंभिक जीवन
महर्षि वाल्मीकि के जन्म के बारे में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं मिलती l उपनिषदों में बस इतना ही वर्णन किया गया है कि ऋषि कश्यप और देवी अदिति की नौवीं संतान वरुण से महर्षि वाल्मीकि का जन्म हुआ था l
एक किंवदन्ती यह भी है कि वाल्मीकि का असली नाम रत्नाकर था और वह एक जंगल में रहते थे l जंगल के रास्ते जो कोई जाता था उसे लूट लेते थे l ईश्वर की ईच्छा के अनुरूप मुनि नारदजी उस रास्ते से गुज़रे l हमेशा की तरह रत्नाकर ने हमला कर दिया l मुनि ने धैर्य पूर्वक रत्नाकर से लूट का कारण पूछा तो रत्नाकर ने बताया कि वह अपने परिवार के पालन पोषण करने के लिए यह काम करता है l तब मुनि ने कहा-"जिस परिवार के पालन के लिए तुम ऐेसे पाप करते हो, क्या वह परिवार तुम्हारे कर्मफल का भागीदार होगा?"रत्नाकर ने पूरे विश्वास के साथ कहा-"हाँ ,क्यों नहीं?"तब मुनि नारदजी ने कहा कि पहले अपने परिवार से पूछ तो लो l जब रत्नाकर ने अपने परिवार से पूछा तो उन्होनें साफ मना कर दिया l
इसी के बाद रत्नाकर के जीवन में बड़ा बदलाव आया और वह वाल्मीकि बनने की राह पर चल दिये l
वाल्मीकि नाम कैसे पड़ा
ज्ञान प्राप्ति के लिए महर्षि ने ध्यान लगाया था l लंबे समय तक एक ही अवस्था में रहने के कारण दीमकों ने उनके शरीर पर बांबी बना दिया l जब महर्षि ध्यान से उठे तब बांबी तोड़कर बाहर आए l तभी से इनका नाम वाल्मीकि पड़ गया l
संस्कृत भाषा के आदि कवि
महर्षि वाल्मीकि को संस्कृत भाषा का आदि कवि माना जाता है l पावन तमसा नदी के तट पर स्थित एक आश्रम में रहकर ईश्वर की भक्ति और समाज कल्याण के लिए प्रयासरत रहते
थे l जीव मात्र के लिए अपार प्रेम और दया से हृदय भरा हुआ था l एक बार जब ईश्वर की वंदना के लिए जा रहे थे तब मार्ग में एक व्याध के द्वारा पक्षी के जोड़े में से एक को मार देने की घटना को देखकर व्याकुल हो गए l और तभी उनके मुख से निकले करुणा भरे छन्द संस्कृत भाषा के प्रथम श्लोक कहलाते हैं I
मा निषाद प्रतिष्ठाम त्वमगम: शास्वती समा l
यत्क्रोन्च मिथुना देकमवधी काम मोहितम् ll
इसका अर्थ है कि निषाद जिसने प्रेम में मग्न निर्दोष पक्षी की निर्मम हत्या की है- को कभी भी शांति नहीं मिले l
रामायण महाकाव्य के रचयिता
महर्षि वाल्मीकि ने राजा राम के जीवन की कथा को इतनी उत्कृष्ट शैली में लिपिबद्ध किया कि वह आज भी केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में सबको जीवन का मार्ग दिखा रही है l इस महाकाव्य के द्वारा महर्षि ने मानव में मानवता और सद्भावना के गुणों का संचार किया है l
माता सीता को आश्रय दिया
जब राजा राम ने प्रजा की नाराजगी के कारण माता सीता को
वनवास के लिए भेज दिया तब महर्षि वाल्मीकि ने उन्हें अपने
आश्रम में आश्रय दिया l इसी आश्रम में माता सीता ने दोनों पुत्रों लव और कुश को जन्म दिया l इन दोनों बालकों को हर
प्रकार की शिक्षा देकर महर्षि ने योग्य और प्रतिभावान पुरुष
के रूप में परिणित किया l
सारांश
महर्षि वाल्मीकि ने एक ऐसे महाकाव्य की रचना की है जो
कई हजार सालों से लोगों को जीवन का सही मार्ग दिखा रहा है और आगे आने वाले समय में लोगों को सन्मार्ग पर ले जाता रहेगा l
एक गुरु, एक माता पिता, समाज का एक जिम्मेदार
सदस्य होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व होना चाहिए कि
हम ऐसे महापुरुषों के बारे में अपने बच्चों को बताएं ताकि वे
इनके व्यक्तित्व से प्रेरणा लेकर अपना जीवन मूल्यवान बनाने का प्रयास कर सकें l

मेरी भी महर्षि वाल्मीकि के प्रति अपार श्रद्धा है l
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