बाल्यावस्था और हमारे बच्चे (childhood And Our Children)

                         एक नजर

आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब संचार माध्यमों के जरिये ज्ञान का विस्फोट सा हुआ है I पुराने समय में जो जानकारी बच्चों को बाल्यावस्था में होती थी उससे अधिक जानकारी अब शैशवावस्था में हो जाती है I इसका स्पष्ट कारण तकनीकी विज्ञान का अकल्पनीय विस्तार है I तकनीकी ने सामाजिक विकास के हर क्षेत्र में अपना अतुलनीय योगदान दिया है I मानव जीवन के हर पहलू में तकनीकी विज्ञान ने हस्तक्षेप कर रखा है I आर्थिक, सामाजिक ,सांस्कृतिक, राजनीतिक, मानसिक हर पहलू में इसका प्रभाव है I 
           तकनीकी विकास के इस दौर में धाराप्रवाह होना एक बहुत बड़ी चुनौती है I इसने सामाजिक विकास को जितना सरल बनाया है  सामाजिक जीवन उतना ही जटिल बन गया है और हमारे बच्चों को आए दिन नई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है I इसलिए आज बात करते हैं बाल्यावस्था और वर्तमान परिदृश्य के बारे में I 
            बाल्यावस्था जीवन का एक ऐसा समय है जब एक बालक दुनिया, समाज, परिवार और भावनाओं को समझने की कोशिश में लगा हुआ होता है I बाल्यावस्था में हर बात, हर घटना बालक को आश्चर्यचकित करती है I दुनिया कैसे बनी, किसने बनाई, क्यों बनाई, सूरज, चांद, तारे आसमान में कैसे टिके हैं, गिरते क्यों नहीं ,सागर में पानी कहाँ से आता है, पानी बर्फ कैसे बन जाता है? ऐसे ही न जाने कितने सवाल उसके मन में  मस्तिष्क में उठते रहते हैं और परेशान करते हैं I और भी कई जरूरतें होती हैं जिनके बारे में अभिभावक और अध्यापक समझ ही नहीं पाते I उस पर माता पिता भी अपने सारे सपने पूरा करने की जिम्मेदारी भी बच्चों पर थोप देते हैं I 
            ऐसे ही अन्य कई कारण हैं जिनकी वजह से आजकल बच्चों का जीवन बडों से अधिक तनावपूर्ण हो गया है I पढ़ाई, खेल, सामाजिक जीवन हर क्षेत्र में आगे बने रहने का दबाव, स्कूल में Number 1 सोसाइटी में Number 1 परिवार में Number 1 हर जगह पर Number 1 होने का दबाव। Number 1 बनने के चक्कर में बच्चे अपना बचपन खोते जा रहे हैं। 
             विद्यालय में अध्यापक और घर में अभिभावक को बच्चों का बचपन  बनाये रखना चाहिए l विद्यालय में 6 घंटे बच्चों को कैदियों की तरह रखा जाता है घर पहुँचते ही tution,home work पूरा करने का बोझऔर उसके बादभी लोग कहते हैं कि ये लड़कl दिन भर करता क्या है? दिन भर की ये भाग दौड़ बच्चे के व्यक्तित्व को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है I 
              बच्चों की भौतिक आयु कम और मानसिक आयु अधिक होती जा रही है जिस कारण उन्हें स्वस्थ बचपन नहीं मिल पाता I आज जो बालक है वो कल देश का जिम्मेदार नागरिक बनेगा I लेकिन अगर वो आज शारीरिक  मानसिक रूप से अस्वस्थ रहेगा तो कल एक स्वस्थ समाज का विकास नहीं कर पाएगा I कल नकारात्मक रुप से प्रभावित बच्चे ही आज समाज के लिए अभिशाप बने हुए हैं I ऐसे बच्चे देश, समाज, परिवार ,सभ्यता, संस्कृति आदि के लिए समस्या की तरह होते हैं I 
             भविष्य में स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए हमें आज से ही अपने बच्चों के लिए अच्छा वातावरण तैयार करना होगा ताकि वे स्वस्थ सोच और समझ के साथ सामाजिक विकास में अपना अमूल्य योगदान दे सकें I स्वाभिमान के साथ उत्कृष्ट समाज का हिस्सा बन सकें I इसके लिए हमें उनके बोझिल जीवन को हल्का करने का प्रयास करना चाहिए l 
              दृढ़ संकल्प के साथ एक अभियान के रूप में योजना बना कर काम करना होगा I ये काम किसी एक दो के वश की बात नहीं है I परिवार और विद्यालय ,अभिभावक और अध्यापक और समाज सबको मिलकर काम करना चाहिए l जब हर संस्थान अपना उत्तरदायित्व गंभीरता पूर्वक निभाएगा तब आने वाले समय में हम अच्छा समाज बना पाएंगे I 

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