बच्चे तो बच्चे

बच्चे कितने प्यारे होते हैं! वे मासूम और मन के सच्चे होते हैं I ईश्वर को तो किसी ने नहीं देखा है लेकिन जब हम किसी बच्चे को देखते हैं तो उसमें ईश्वर की छवि दिखाई देती है I अरे,अरे! ज्यादा भावुक न होइए, बच्चे जितने मासूम और सच्चे होते हैं उतने ही शरारती भी I प्रचालित भाषा में कहूँ तो 'बच्चे शैतान के नाना होते हैं I' मैंने बहुत से लोगों को यह कहते हुए सुना है कि हम दिनभर काम कर सकते हैं पर किसी बच्चे को संभालना हमारे बस की बात नहीं है I 
              ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बच्चे एक क्षण के लिए भी शांत नहीं रहते I अपनी जिज्ञासा और कौतूहल के लिए एक के बाद एक अनेक प्रश्न पूछा करते हैं जिससे उनके आसपास के लोगों का सिर चकरा जाता है और लोग अपनी जान बचाकर भागने में अपनी भलाई समझते हैं I 
                खैर दूसरे लोग जान बचाकर भाग सकते हैं लेकिन बच्चे के माता-पिता तो भाग नहीं सकते I तो मेरा ये लेख उन माता पिता के लिए है जो अपने बच्चों का अच्छा विकास, सर्वागीण विकास करना चाहते हैं I जो माता पिता अपने बच्चों से प्यार करते हैं और उनका पालन-पोषण प्यार से करना चाहते हैं I 
                  ये बात सच है कि ज्यादा प्यार-दुलार के कारण बच्चे बिगड़ जाते हैं किन्तु बिना प्यार के बच्चों का सर्वांगीण विकास तो हो ही नहीं सकता है ना I आपने ये कहावत तो सुनी ही होगी, ''ये तो सर्कस का शेर हैI'' मेरा कहने का मतलब ये है कि कठोर अनुशासन से बच्चे नियमित होंगे,शरारत नहीं करेंगे,लेकिन सजा के भय से बच्चों के अंदर जो सृजनात्मकता (creativity)होती है वो उभर कर सामने नहीं आ पाती है I 
                     अब आप कहेंगे कि तब क्या करें, प्यार  दुलार से बच्चे बिगड़ जाएंगे, डांटने-मारने से बच्चे सृजनात्मक नहीं बनेंगे I तो फिर बच्चों का सर्वांगीण विकास होगा कैसे? मैं बताती हूँ कि कैसे होगा I सर्वागीण विकास में बच्चे का शरीर, मन ,बुद्धि, भावनात्मक तथा सामाजिकता आदि बातों को शामिल किया जाता है I इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए माता पिता को बच्चों के साथ सन्तुलित व्यवहार करना चाहिए मतलब ना ज्यादा प्यार ना ज्यादा अनुशासन इसी बात को दूसरे तरीके से समझा जाए तो आवश्यकता अनुसार नरमी से पेश आयेंगे और आवश्यकता अनुसार कड़ाई करेंगे I 
                   कहा जाता है कि पिता को नारियल के बाहरी हिस्से की तरह कठोर तथा माँ को अंदरूनी हिस्से की तरह मुलायम होना चाहिए l मतलब पिता कठोरता के साथ बच्चों को अनुशासन सिखाये तो माँ प्यार से I क्योंकि संतुलित विकास के लिए डांट-फटकार के साथ प्यार भी जरूरी है I पिता को कठोर होना चाहिए लेकिन हमेशा हंटर लेकर नहीं खड़ा रहना चाहिए I यदि वह हमेशा हंटर लेकर खड़ा रहेगा तो अपने लाडलों का सर्वांगीण विकास नहीं कर पाएगा I यहां मैं ये कहना चाहती हूँ कि पिता बच्चों से भावनात्मक रूप से जुड़ा रहे ताकि बच्चे कठोरता में छुपे प्यार को समझ सकें I 
                 सबसे बड़ी बात  माता-पिता सूझ- बूझ के साथ मिलकर अपने बच्चों के उत्तम व्यक्तित्व निर्माण के लिए प्रयास करें I मैंने देखा है कि जिन माता-पिता का  आपसी  समायोजन अच्छा होता है उन माता-पिता के बच्चों  के व्यक्तित्व में निखार होता है I माता-पिता आपस में  जितना सुलझे हुए होंगे बच्चों का सर्वांगीण विकास उतना ही सुदृढ़ होगा I 


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